ठेले पे हिमालय

भाषा मे अस्तित्व की खोज

आपकी अनुपस्थिति

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ग्यारह महीने आप दूर रहे,
क्या खोज लिया आपने अपना अस्तित्व?
आप का तो पता नहीं,
आपकी खोज में हमारी पहचान खो गयी।

आप साल भर में घूम आए सारी दुनिया,
देख आए नए रंग और नए चहरे?
आपकी बेपरवा अनुपस्थिति में,
हमारा रंग और फीका पड़ गया।

Written by Gaizabonts

January 14, 2009 at 7:34 am

भगवान बनाने वाले

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भगवान बनाने वाले, क्या तेरे मन में समाई? काहे को भगवान बनाया?

अगर मैं आज यहाँ नही होता, तो मेरी जगह पे वह बैठा रहता । तुम लोग यह बात समझ नही पाओगे । वो मेरा दोस्त ही नही, मेरा सबसे बड़ा प्रतिद्वन्द्वी भी था ।

आज किसी को भगवान बना ने में तुम लोग देर नही करते । सरल-सादे मनुष्य को सुविधाजनक भगवान बना देते हो । तुम भूल जाते हो के वह आखिर एक सादा मनुष्य है, पर वह स्वयं कैसे भूले अपने आप को? वह तो मनुष्य जैसा व्यवहार करता है । तब, तुम्हारी दृष्टि में वह गिर जाता है । पर किसी मिट्टी के देवता की तरह, तुम उसका विसर्जन भी नही कर सकते । तुम्हें ऐसा भगवान चाहिये जिसे तुम कोस सकते हो, गाली दे सकते हो । उसे धरती पर पटक सकते हो, आकाश में स्थापित कर सकते हो । तुम्हें नियंत्रण की सुविधा चाहिये, भगवान नही । जब चाहा बना दिया, जब चाहा गिरा दिया । मूर्ति भी तुम्हारी, मूर्तितल भी तुम्हारा । कटघरे में खड़ा बेचारा भला आदमी ।

मैं नही तो आज वह तुम्हारा भगवान रहता । पता नही, भगवान बनाने वाले, क्या तेरे मन में समाई?

Written by Gaizabonts

February 27, 2008 at 12:37 am

वो शहर…

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वो शहर की भीड़ में अपना रास्ता ढूंढना
वो ठेले पर सस्ते में जल्दी से नाश्ता करना
वो वक्त को बचाने के लिए लोकल से लटकना

वो पसीने से लथपथ धूप मे सुख रही कमीज़
वो दर्द भरे बदन की आँखों मे कल के सपने
वो फिसलते हुए लमहें, उन्हे बटोरने का प्रयास

वो घर से दूर रहना
वो घर की याद को भुलाने की कोशिश

Written by Gaizabonts

February 19, 2008 at 11:22 pm

वो नहीं अाते, उनकी याद अाती है

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वो कुछ लोग है, कुछ यादें है
वो कुछ लमहें है, कुछ साल है।
इस दिन, हर साल यहीं
हमारी अकेले में बातचीत है।

Written by Gaizabonts

January 19, 2008 at 7:52 pm

चलो इक बार फीर से…

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चलो प्रणय के बंधन में हमारी किस्मत का विवाह कर लें। कुछ रंग फीका है, पर एक नाक्शा है मेरे हाथों में। शायद कुछ रास्ते याद आ जाएं, जो हम भूल गये हैं।

किसी कविता से प्रेरित हो, मैं तुम से प्यार करूँ, तुम भी इन रास्तों पर चल कर कुछ याद करो। मैं कविता तो लिख नही पाता, इस गद्य से काम चला लो, अलंकार साथ देते नही, तुम ही दे दो।

शब्द बने मेरे दुश्मन, तुम तो साथ दे दो?

Written by Gaizabonts

November 25, 2007 at 12:18 am

परीक्षा

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अगर मैं कहूँ कि मैं पिछले चार महीने हिन्दी मे लिखने के तरीके ढूंढ रहा था, तो क्या आप मेरा विश्वास करेंगे? शायद नही। पर यह सच है। मॉक द्वारा कुछ परीक्षण और निरीक्षण। कुछ खोज।

Written by Gaizabonts

November 14, 2007 at 10:05 pm

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मॅक में पहला चिठ्ठा

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मॅक में लिखा गया पहला चिठ्ठा। कया अाप इसे ठिक से पढ पा रहें हैं?

Written by Gaizabonts

September 15, 2007 at 3:24 pm

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MacShift

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I recently shifted to a Mac. Would you know of a Hindi/Marathi transliteration software for the Mac? My search is on, if you can help, I’d be grateful. In the meanwhile, posting may be slow(er).

Thank you!

Written by Gaizabonts

September 15, 2007 at 2:28 pm

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नहीं, आप नहीं

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नहीं, नहीं, आप नहीं
मैं ही कुछ बदल सा गया हूँ।

जिस राह पर हम साथ चल रहे थे
उस राह से थोडा भटक गया हूँ,
आप सब को अब भी साथ देखता कर
जाहिर है, मैं ही बहक गया हूँ।

नहीं, नहीं, आप नहीं
मैं ही कुछ बदल सा गया हूँ।

कुछ सपने हम साथ बुनना चाहते थे
सच्चाई से टक्कर खा कर वह चूर हुए हैं
कुछ टुकडे आप समेट कर वहाँ चले हो
कुछ को ले कर मैं इस ओर चला हूँ।

नहीं, नहीं, आप नहीं
मैं ही कुछ बदल सा गया हूँ।

अब कुछ इतनी दूरी हो चली है हम में
चिल्लाए बिना बात ही नही हो पाती
और इस काल की हवाओं का खेल भी देखो
कुछ शब्द अपने साथ कहीं और ले जाते हैं।

नहीं, नहीं, आप नहीं
मैं ही कुछ बदल सा गया हूँ।

Written by Gaizabonts

July 1, 2007 at 11:51 pm

क्रोध

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Neptune and Triton - 10

तुम्हारे नाम, न जाने कितने शब्द कटें, मरें।

हर इच्छा का अंतिम संस्कार कर आया हूँ, हर खुशी को अग्नि दे आया हूँ। तुम्हारे जाने का समय आ गया है।

Written by Gaizabonts

June 17, 2007 at 11:37 pm