दोस्तों से गुज़ारिश

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वक्त होता नहीं निकलना पड़ता है,
बंद शीशों की अलमारी के दरवाजे खोलो।
तम्मान्ना से ताले तोड़ो; पीछे वक्त सड़ता है,
मिल बैठो, कुछ हमारी सुनो, कुछ अपनी बोलो।

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अन्दर, एक खलनायक

IMG_2178.jpgकाला

वही जो सताता है, शांति भंग करता है। हर वह बात जो मन के क़रीब हो, घनिष्ठ हो, उसे बदलता हुआ, उसे तोड़ता हुआ। वो बुरा आदमी। तुम्हारे अन्दर बसा हुआ। तुम्हारा ही असिद्ध रूप। तुम्हे वहां ले जाता है, जिस जगह से तुम परिचित नहीं। डर पैदा करता है, असुरक्षितता की पहचान करवाता है।

अंधकार

तुम कुछ बदलना चाहते थे। पर इस तरह नहीं। तुम संगत ढूंड रहे थे, पर इस तरह नहीं। और जब बदलाव होने लगा, तुम देहली पर अड़े रहे, जैसे तुम्हारे पांव इस दुनिया में अटके, भार से भरे। तब उस खलनायक ने तुम्हे धक्का देना चाहा – तुमने उसे भागना चाहा। अब देहली पार हुए तुम दोनों।

द्वन्द-युद्ध

घनघोर। वह हारा। तुम जीते। बहादुर नायक भी तुम और वह कपटी खलनायक भी तुम। जीत कर भी तुम खुश नहीं – जिस दुनिया में तुम जीते, वह तुम्हारी नहीं।

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आभार

कहते हैं, जो आप कहना चाहते हैं, उसे किसीने, कही पर, पहले ही कह दिया है. आज मेरे मन की बात, बहुत सुन्दरता से, शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ ने कहा है.

जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला, उस-उस राही को धन्यवाद।

जीवन अस्थिर अनजाने ही, हो जाता पथ पर मेल कहीं,
सीमित पग डग, लम्बी मंज़िल, तय कर लेना कुछ खेल नहीं।
दाएँ-बाएँ सुख-दुख चलते, सम्मुख चलता पथ का प्रसाद –
जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला, उस-उस राही को धन्यवाद।

साँसों पर अवलम्बित काया, जब चलते-चलते चूर हुई,
दो स्नेह-शब्द मिल गये, मिली नव स्फूर्ति, थकावट दूर हुई।
पथ के पहचाने छूट गये, पर साथ-साथ चल रही याद –
जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला, उस-उस राही को धन्यवाद।

जो साथ न मेरा दे पाये, उनसे कब सूनी हुई डगर?
मैं भी न चलूँ यदि तो क्या, राही मर लेकिन राह अमर।
इस पथ पर वे ही चलते हैं, जो चलने का पा गये स्वाद –
जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला, उस-उस राही को धन्यवाद।

कैसे चल पाता यदि न मिला होता मुझको आकुल अंतर?
कैसे चल पाता यदि मिलते, चिर-तृप्ति अमरता-पूर्ण प्रहर!
आभारी हूँ मैं उन सबका, दे गये व्यथा का जो प्रसाद –
जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला, उस-उस राही को धन्यवाद।

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मेरे शब्द और मैं

“आप इतनी अच्छी हिंदी बोल लेते हो?”

बम्बई में रह कर, आपकी पूरी दुनिया सुधर सकती है. आपकी भाषा, मगर, भ्रष्ट हो जाएगी, शायद नष्ट भी हो जाएगी. पता नही कहाँ, पता नहीं क्यूँ, बम्बई के बाहर, मैं अच्छी हिंदी बोल लेता हूँ. आयेला, गयेला, लागेला – इन शब्दों का प्रयोग बम्बई के बाहर नहीं होता. सामनेवाला जिस तरह से हिंदी बोलता है, हमारी भाषा वह तेवर पकड़ लेती है. इस दिसंबर, कुच्छ दोस्तों के साथ हम भोपाल पहुंचें. मेरा मन कहता था के, भोपाल में, सब सुरमा भोपाली के तरह बात करेंगे. कई बार शोले देखने का असर, कह लीजिए. मैं सोच में पड गया. भाषा का उद्देश्य क्या है? केवल अपने विचार जाताना. अगर ऐसा है तो क्या फरक पड़ता है अगर मैं बम्बैय्या हिंदी में बात करूँ या भूपाली?

आपको हमारी बात समझने से मतलब हैं ना?

मेरे शब्दों के छंटाव से क्या आप मेरे चरित्र की आज़माइश करेंगे?

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अब नहीं

कुछ बातें ऐसी होती है जो चाहने पर भी भूली नहीं जाती। कुछ लोग भी ऐसे होते हैं। तुम उन में से एक हो। तुम्हारा गुस्सा जायज़ था, शायद, पर तब के मेरे हालत तुम्हारे गुस्से से भी जायज़ थे। और तुम मेरे हालात को खूब पहचानते थे। जब उन हालात के नीचे मैं पूरी तरह कुचल गया था, तब तुमने उन पर तुम्हारा पैर रखा। अब हाथ मत बढाओ।

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हम रहें न हम, तुम रहें न तुम

आप कि अभिलाषा
मेरा बलिदान
आप का आनंद
मेरा बदलना
आपका खिन्न

आपकी एक नई अभिलाषा
मेरा बलिदान
आप का आनंद
मेरा बदलना
आपका खिन्न

आपकी एक नई…

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धर्म का अधिकार

मंदिर के सामने उनका दफ्तर
रस्ते के इस पार मंदिर और उस पार उनका दफ्तर
वे जो बन बैठे है हमारे धर्म के प्रतिनिधि
माहोल बना बैठे है, शोर असीमित.

शाम की आरती सुनाई नहीं देती,
इन धर्माधिकारियों के शराबी शोर में
भगवान तो बुत ही था, अब भक्त भी बुत बन बैठे
अब राजनीती तय करेगा हमारा धर्म, हमारा अधिकार.

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