अकेले, साथ में
इस भीड़ में हम अकेले हैं
थैली के हठी मूठ को बार-बार कंधे पे चढ़ाते हैं, उनको जगह पर रखने के लिये, पर वे मानते नहीं; फिसलतें हैं वे आराम की खोज मे रहते हैं एक नन्ही सी शुभ-कामना, छोटी सी चर्चा और हम अकेले चलते है
वर्णहीन भावनाओं से अपने आप को बचाते है, बीच का सब खो जाता है और रंग से अपरिचित हो जाते है और इसी सुंदरता को बंद कमरों के आकार मे चुनिंदा चित्रों मे खोज; हम अकेले चलते है
अपनी दुनिया स्वः बनाते हैं, छोटी और बंद; किसी को प्रवेश नहीं होता इस दुनिया में अपना सही-गलत का अपना अर्थ होता है अगर अपनी दुनिया से बाहर निकले भी तो, हम अकेले चलते है
गद्य और पद्य की सीमाएं खो जाती हैं, गद्य पद्य बनने की आशा करता है, कला के नाम पे कुछ भी चलता है इस युग में आदर का अर्थ और आधार खोया है; दरअसल अर्थ का ही अर्थ खोया हैं पर हम कुछ अर्थ निकाल लेते है, और हम अकेले चलते है
हमारे भय में, किंतु, हम साथ चलते है संयुक्त नहीं, साथ में भय का कोई भी नाम हो, कोई भी आकार हो, हम उसे अपना बना लेते हैं उसे एक ऐसा आकार देतें हैं जो परिचित हो – और हम उससे भयभीत हो ऐसे में हम अकेले चलते है, साथ में
