क्या आप उन्हें जानते है?
आप जानते है, यहाँ आपके बहुत निष्ठावान प्रशंसक है।
-उन्हें मित्र कहें, प्रशंसक नहीं।
छोडिये, अब अधिक भावुक ना करें। चलिये, दो-चार घूँट हो जाय; मन की बात व्यक्त करें।
-अब उनका असर नहीं होता। आप तो दार्शनिक तौर से बहस करने लगें।
आप जानते है, आपका लिखना, आपके विचार, उनके लिये है जो आपको जानते नहीं है। आपके तत्व से हम परिचित है। हम तो आप को पहचानते है।
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ऐसा ही लगता है, कि हम ‘उन्हे’ पहचानते है, उनके तत्व से परिचित है। कुछ समय बाद, पता चलता है, हमने उन्हें कभी पहचानाही नहीं। हम भूल जाते है, लोग बदलते है, उनकी परिस्थिति बदलती है।
हर समय नई पहचान बनानी पडती है।