अब बस
कुछ ऐसे अनोखे भाव
कभी बोल कर भी व्यक्त नहीं होते
शब्दों की गाड़ी उनके भाग्य में नहीं होती
सबसे चहेते होते ऐसे भाव
रह जाते उनके सृष्टा के पास
बन बैठते उनके लाडले।
पर अब उन्हें जाना होगा
मेरे घर में अब जगह नहीं
इन्हें किस कारण अब तक पोसा
छाती पर इनका तांडव अब सह नहीं पाता
मेरी नीरवता अब उसे समझ नहीं आती
चीखता हूँ पर उसे आवाज़ नहीं आती।
गूढ़ कविता है… सुन्दर!!!
Pratik Pandey
December 4, 2006 at 6:55 am
==प्रतिकजी: हाँ, कुछ गूढ़ है; धन्यवाद!
gaizabonts
December 6, 2006 at 10:20 pm