ठेले पे हिमालय

भाषा मे अस्तित्व की खोज

अब बस

with 2 comments


कुछ ऐसे अनोखे भाव
कभी बोल कर भी व्यक्त नहीं होते
शब्दों की गाड़ी उनके भाग्य में नहीं होती
सबसे चहेते होते ऐसे भाव
रह जाते उनके सृष्टा के पास
बन बैठते उनके लाडले।


पर अब उन्हें जाना होगा
मेरे घर में अब जगह नहीं
इन्हें किस कारण अब तक पोसा
छाती पर इनका तांडव अब सह नहीं पाता
मेरी नीरवता अब उसे समझ नहीं आती
चीखता हूँ पर उसे आवाज़ नहीं आती।

Written by Gaizabonts

November 2, 2006 at 12:06 am

2 Responses

Subscribe to comments with RSS.

  1. गूढ़ कविता है… सुन्दर!!!

    Pratik Pandey

    December 4, 2006 at 6:55 am

  2. ==प्रतिकजी: हाँ, कुछ गूढ़ है; धन्यवाद!

    gaizabonts

    December 6, 2006 at 10:20 pm


Leave a Reply