ठेले पे हिमालय

भाषा मे अस्तित्व की खोज

नहीं, आप नहीं

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नहीं, नहीं, आप नहीं
मैं ही कुछ बदल सा गया हूँ।

जिस राह पर हम साथ चल रहे थे
उस राह से थोडा भटक गया हूँ,
आप सब को अब भी साथ देखता कर
जाहिर है, मैं ही बहक गया हूँ।

नहीं, नहीं, आप नहीं
मैं ही कुछ बदल सा गया हूँ।

कुछ सपने हम साथ बुनना चाहते थे
सच्चाई से टक्कर खा कर वह चूर हुए हैं
कुछ टुकडे आप समेट कर वहाँ चले हो
कुछ को ले कर मैं इस ओर चला हूँ।

नहीं, नहीं, आप नहीं
मैं ही कुछ बदल सा गया हूँ।

अब कुछ इतनी दूरी हो चली है हम में
चिल्लाए बिना बात ही नही हो पाती
और इस काल की हवाओं का खेल भी देखो
कुछ शब्द अपने साथ कहीं और ले जाते हैं।

नहीं, नहीं, आप नहीं
मैं ही कुछ बदल सा गया हूँ।

Written by Gaizabonts

July 1, 2007 at 11:51 pm

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