ठेले पे हिमालय

भाषा मे अस्तित्व की खोज

वो शहर…

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वो शहर की भीड़ में अपना रास्ता ढूंढना
वो ठेले पर सस्ते में जल्दी से नाश्ता करना
वो वक्त को बचाने के लिए लोकल से लटकना

वो पसीने से लथपथ धूप मे सुख रही कमीज़
वो दर्द भरे बदन की आँखों मे कल के सपने
वो फिसलते हुए लमहें, उन्हे बटोरने का प्रयास

वो घर से दूर रहना
वो घर की याद को भुलाने की कोशिश

Written by Gaizabonts

February 19, 2008 at 11:22 pm

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