भगवान बनाने वाले
भगवान बनाने वाले, क्या तेरे मन में समाई? काहे को भगवान बनाया?
अगर मैं आज यहाँ नही होता, तो मेरी जगह पे वह बैठा रहता । तुम लोग यह बात समझ नही पाओगे । वो मेरा दोस्त ही नही, मेरा सबसे बड़ा प्रतिद्वन्द्वी भी था ।
आज किसी को भगवान बना ने में तुम लोग देर नही करते । सरल-सादे मनुष्य को सुविधाजनक भगवान बना देते हो । तुम भूल जाते हो के वह आखिर एक सादा मनुष्य है, पर वह स्वयं कैसे भूले अपने आप को? वह तो मनुष्य जैसा व्यवहार करता है । तब, तुम्हारी दृष्टि में वह गिर जाता है । पर किसी मिट्टी के देवता की तरह, तुम उसका विसर्जन भी नही कर सकते । तुम्हें ऐसा भगवान चाहिये जिसे तुम कोस सकते हो, गाली दे सकते हो । उसे धरती पर पटक सकते हो, आकाश में स्थापित कर सकते हो । तुम्हें नियंत्रण की सुविधा चाहिये, भगवान नही । जब चाहा बना दिया, जब चाहा गिरा दिया । मूर्ति भी तुम्हारी, मूर्तितल भी तुम्हारा । कटघरे में खड़ा बेचारा भला आदमी ।
मैं नही तो आज वह तुम्हारा भगवान रहता । पता नही, भगवान बनाने वाले, क्या तेरे मन में समाई?
Since you have linked to my post I am going to take the liberty of telling you that the interpretation or the come back to what I said is rather exaggerated in my perspective.
Putting some one on a pedestal is far from giving some one the position of the almighty. Looking up to some one as they have always portrayed strength and conviction and ideals. When one day you find that what is said is not practised but far from it one tends to get disappointment.
My pedestal I guess is referring to expectations. In either case I agree we ask for a lot.
educatedunemployed
February 27, 2008 at 1:30 am
कैसे कहूं मैं तुम से, अपने इस दिल की बात,
हिम्म्म्मत तो की इतनी, लबों ने पर न दिया साथ.
अपनी यह चाहत ले कर, करूं मैं अब तुझसे क्या इजहार,
दिन तो कट जाते हैं कट ती नही यह रात.
Ram Sewak
February 27, 2008 at 2:01 am
@DR:
Accepted. Consider this a poetic license, then?
@राम सेवक:
ठेले पे हिमालय पर आपका सवागत हैं। आपकी बात का संदर्भ जान नहीं पाया।
Gaizabonts
January 14, 2009 at 7:42 am