मंदिर के सामने उनका दफ्तर
रस्ते के इस पार मंदिर और उस पार उनका दफ्तर
वे जो बन बैठे है हमारे धर्म के प्रतिनिधि
माहोल बना बैठे है, शोर असीमित.
शाम की आरती सुनाई नहीं देती,
इन धर्माधिकारियों के शराबी शोर में
भगवान तो बुत ही था, अब भक्त भी बुत बन बैठे
अब राजनीती तय करेगा हमारा धर्म, हमारा अधिकार.