मेरे शब्द और मैं

“आप इतनी अच्छी हिंदी बोल लेते हो?”

बम्बई में रह कर, आपकी पूरी दुनिया सुधर सकती है. आपकी भाषा, मगर, भ्रष्ट हो जाएगी, शायद नष्ट भी हो जाएगी. पता नही कहाँ, पता नहीं क्यूँ, बम्बई के बाहर, मैं अच्छी हिंदी बोल लेता हूँ. आयेला, गयेला, लागेला – इन शब्दों का प्रयोग बम्बई के बाहर नहीं होता. सामनेवाला जिस तरह से हिंदी बोलता है, हमारी भाषा वह तेवर पकड़ लेती है. इस दिसंबर, कुच्छ दोस्तों के साथ हम भोपाल पहुंचें. मेरा मन कहता था के, भोपाल में, सब सुरमा भोपाली के तरह बात करेंगे. कई बार शोले देखने का असर, कह लीजिए. मैं सोच में पड गया. भाषा का उद्देश्य क्या है? केवल अपने विचार जाताना. अगर ऐसा है तो क्या फरक पड़ता है अगर मैं बम्बैय्या हिंदी में बात करूँ या भूपाली?

आपको हमारी बात समझने से मतलब हैं ना?

मेरे शब्दों के छंटाव से क्या आप मेरे चरित्र की आज़माइश करेंगे?

About Atul Sabnis

Addicted to all things 2.0, 1.0 at a time! Likes: Movie Musings, Photo Philosophy, Art Arguments, Education Environments and Writing Rigour
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