काला
वही जो सताता है, शांति भंग करता है। हर वह बात जो मन के क़रीब हो, घनिष्ठ हो, उसे बदलता हुआ, उसे तोड़ता हुआ। वो बुरा आदमी। तुम्हारे अन्दर बसा हुआ। तुम्हारा ही असिद्ध रूप। तुम्हे वहां ले जाता है, जिस जगह से तुम परिचित नहीं। डर पैदा करता है, असुरक्षितता की पहचान करवाता है।
अंधकार
तुम कुछ बदलना चाहते थे। पर इस तरह नहीं। तुम संगत ढूंड रहे थे, पर इस तरह नहीं। और जब बदलाव होने लगा, तुम देहली पर अड़े रहे, जैसे तुम्हारे पांव इस दुनिया में अटके, भार से भरे। तब उस खलनायक ने तुम्हे धक्का देना चाहा – तुमने उसे भागना चाहा। अब देहली पार हुए तुम दोनों।
द्वन्द-युद्ध
घनघोर। वह हारा। तुम जीते। बहादुर नायक भी तुम और वह कपटी खलनायक भी तुम। जीत कर भी तुम खुश नहीं – जिस दुनिया में तुम जीते, वह तुम्हारी नहीं।
मैं जीती वह हारा. नहीं डरा सकता कोई मुझे. सच का दामन थाम रखा है, कैसा भय.
शशी. स्वागत!
अच्छी बात कही आपने!