ठेले पे हिमालय

भाषा मे अस्तित्व की खोज

नहीं, आप नहीं

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नहीं, नहीं, आप नहीं
मैं ही कुछ बदल सा गया हूँ।

जिस राह पर हम साथ चल रहे थे
उस राह से थोडा भटक गया हूँ,
आप सब को अब भी साथ देखता कर
जाहिर है, मैं ही बहक गया हूँ।

नहीं, नहीं, आप नहीं
मैं ही कुछ बदल सा गया हूँ।

कुछ सपने हम साथ बुनना चाहते थे
सच्चाई से टक्कर खा कर वह चूर हुए हैं
कुछ टुकडे आप समेट कर वहाँ चले हो
कुछ को ले कर मैं इस ओर चला हूँ।

नहीं, नहीं, आप नहीं
मैं ही कुछ बदल सा गया हूँ।

अब कुछ इतनी दूरी हो चली है हम में
चिल्लाए बिना बात ही नही हो पाती
और इस काल की हवाओं का खेल भी देखो
कुछ शब्द अपने साथ कहीं और ले जाते हैं।

नहीं, नहीं, आप नहीं
मैं ही कुछ बदल सा गया हूँ।

Written by Gaizabonts

July 1, 2007 at 11:51 pm

क्रोध

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Neptune and Triton - 10

तुम्हारे नाम, न जाने कितने शब्द कटें, मरें।

हर इच्छा का अंतिम संस्कार कर आया हूँ, हर खुशी को अग्नि दे आया हूँ। तुम्हारे जाने का समय आ गया है।

Written by Gaizabonts

June 17, 2007 at 11:37 pm

सपने देखो

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Brown Brick House - 1

सपने देखो, पर उनके सच होने की शर्त मत रखो।

Written by Gaizabonts

June 3, 2007 at 10:25 pm

दस गुना और

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Cricket on the Beach

 

वहाँ ३॰॰ हो चुके – यहाँ बस इकतीस। अब तक तो सेन्चुरी भी नही हुई यहाँ, बात कर रहे हैं तीन सौ की।

Written by Gaizabonts

April 23, 2007 at 9:35 pm

दर्द

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जितना होता है, उतनी ही उसकी आदत हो जाती है। जितनी आदत होती है, उतना ही दर्द कम होता है (दर्द कम नहीं होता, हमारा ध्यान कम हो जाता है)। दर्द भी मायूस होकर चला जाता है – जहाँ प्यार ना मिले वहाँ क्या रहना?

Written by Gaizabonts

March 31, 2007 at 5:09 pm

चेहरे

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पिछले सप्ताह हम लंडन आर्ट फ़ेर गये थे । अनेक कलाकार वहाँ अपने काम का प्रदर्शन कर रहे थे । वैसे तो शायद मैं वहाँ जाता नही, पर पिछले दिन समाचार पत्र में पढा के फ़िलिप लोर्का-दिकोर्सिया के कुछ चित्र भी थे । उनके काम का मैं प्रशंसक हूँ ।

दुर्भाग्य से उनके केवल तीन चित्र ही थे । इसके बावजूद, उनकी कला को आमने-सामने देखना, अपने-आप में एक अलग अनुभव था। अगर आप उनका काम देखना चाहते है, तो गुगल के ईमेज सर्च में philip lorca dicorcia head खोजें । इस कलाकार के बारे में यहां पढें

Written by Gaizabonts

January 27, 2007 at 2:38 pm

की ट्रांस

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कुछ एक घंटा हो गया है अब कई बार खोज कर चुका हूँ . पर अब तक की ट्रांस मे 60 लिख नही पा रहा हूँ . हमेशा साथ हो जाता है . अक्षरों को कैसे भी जोड़ो , साथ ही निकल आता है . क्या आप मे से कोइ जानता है की ट्रांस मे “साठ” कैसे लिखते है ?

Written by Gaizabonts

January 27, 2007 at 1:46 pm

Posted in भाषा

कहीं ऐसा ना हो

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अगर यह भाषा में अस्तित्व की खोज है,
इस तरह
कहीं अस्तित्व ही न खो जाए!

Written by Gaizabonts

December 6, 2006 at 10:33 pm

अब बस

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कुछ ऐसे अनोखे भाव
कभी बोल कर भी व्यक्त नहीं होते
शब्दों की गाड़ी उनके भाग्य में नहीं होती
सबसे चहेते होते ऐसे भाव
रह जाते उनके सृष्टा के पास
बन बैठते उनके लाडले।


पर अब उन्हें जाना होगा
मेरे घर में अब जगह नहीं
इन्हें किस कारण अब तक पोसा
छाती पर इनका तांडव अब सह नहीं पाता
मेरी नीरवता अब उसे समझ नहीं आती
चीखता हूँ पर उसे आवाज़ नहीं आती।

Written by Gaizabonts

November 2, 2006 at 12:06 am

उत्तर

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एक जीवन ऐसा ही है
आपके द्वार के आगे
खटखटाते रह गये
आप आयें न पिया

आप तो बना गये
अपनी ही नियम यहाँ
मेरे अनुभव आपको
जचते है इस पल कहाँ

आपकी अपनी दुनिया
आपके अपने स्वप्न
हम कहाँ उस भाग्य के
तत्व की अभीलशा करें….

Written by Gaizabonts

October 21, 2006 at 12:28 am