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जितना होता है, उतनी ही उसकी आदत हो जाती है। जितनी आदत होती है, उतना ही दर्द कम होता है (दर्द कम नहीं होता, हमारा ध्यान कम हो जाता है)। दर्द भी मायूस होकर चला जाता है - जहाँ प्यार ना मिले वहाँ क्या रहना?
पिछले सप्ताह हम लंडन आर्ट फ़ेर गये थे । अनेक कलाकार वहाँ अपने काम का प्रदर्शन कर रहे थे । वैसे तो शायद मैं वहाँ जाता नही, पर पिछले दिन समाचार पत्र में पढा के फ़िलिप लोर्का-दिकोर्सिया के कुछ चित्र भी थे । उनके काम का मैं प्रशंसक हूँ ।
दुर्भाग्य से उनके केवल तीन चित्र ही थे । इसके बावजूद, उनकी कला को आमने-सामने देखना, अपने-आप में एक अलग अनुभव था। अगर आप उनका काम देखना चाहते है, तो गुगल के ईमेज सर्च में philip lorca dicorcia head खोजें । इस कलाकार के बारे में यहां पढें ।
कुछ एक घंटा हो गया है अब कई बार खोज कर चुका हूँ . पर अब तक की ट्रांस मे 60 लिख नही पा रहा हूँ . हमेशा साथ हो जाता है . अक्षरों को कैसे भी जोड़ो , साथ ही निकल आता है . क्या आप मे से कोइ जानता है की ट्रांस मे “साठ” कैसे लिखते है ?
अगर यह भाषा में अस्तित्व की खोज है,
इस तरह
कहीं अस्तित्व ही न खो जाए!
कुछ ऐसे अनोखे भाव
कभी बोल कर भी व्यक्त नहीं होते
शब्दों की गाड़ी उनके भाग्य में नहीं होती
सबसे चहेते होते ऐसे भाव
रह जाते उनके सृष्टा के पास
बन बैठते उनके लाडले।
पर अब उन्हें जाना होगा
मेरे घर में अब जगह नहीं
इन्हें किस कारण अब तक पोसा
छाती पर इनका तांडव अब सह नहीं पाता
मेरी नीरवता अब उसे समझ नहीं आती
चीखता हूँ पर उसे आवाज़ नहीं आती।
एक जीवन ऐसा ही है
आपके द्वार के आगे
खटखटाते रह गये
आप आयें न पिया
आप तो बना गये
अपनी ही नियम यहाँ
मेरे अनुभव आपको
जचते है इस पल कहाँ
आपकी अपनी दुनिया
आपके अपने स्वप्न
हम कहाँ उस भाग्य के
तत्व की अभीलशा करें….
अहंकार के वध का गर्व, क्या अहंकार का एक रूप है?
बहुत दिन हुए, हिन्दी में लिखे हुए। शायद यहाँ, वर्डप्रेस पर और लिखा जायेगा। नई शुरुआत करने के कारण कई होते है, कारण ना होने का भी कभी कारण होता है?
७ सितम्बर २००५ को हिन्दी में पहला चिट्ठा लिखा था, आज, कुछ एक साल बाद, यहाँ एक नई शुरुआत । पिछले कुछ महीनों से ‘ठेले पे हिमालय‘ पर मित्रों का आना भी बंद हुआ है - मेरे लिये शायद एक चिन्ह है - बर्फ पिघल रहा है ।
आप जानते है, यहाँ आपके बहुत निष्ठावान प्रशंसक है।
-उन्हें मित्र कहें, प्रशंसक नहीं।
छोडिये, अब अधिक भावुक ना करें। चलिये, दो-चार घूँट हो जाय; मन की बात व्यक्त करें।
-अब उनका असर नहीं होता। आप तो दार्शनिक तौर से बहस करने लगें।
आप जानते है, आपका लिखना, आपके विचार, उनके लिये है जो आपको जानते नहीं है। आपके तत्व से हम परिचित है। हम तो आप को पहचानते है।
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ऐसा ही लगता है, कि हम ‘उन्हे’ पहचानते है, उनके तत्व से परिचित है। कुछ समय बाद, पता चलता है, हमने उन्हें कभी पहचानाही नहीं। हम भूल जाते है, लोग बदलते है, उनकी परिस्थिति बदलती है।
हर समय नई पहचान बनानी पडती है।

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