विधि-लिखित

धर्म-ग्रंथ सब जला चुकी है
जिसके अंतर की ज्वाला,
मंदिर, मस्जिद, गिरजे – सबको
तोड़ चुका जो मतवाला,

पंडित, मोमिन, पादरियो के
फंदों को जो काट चुका
कर सकती है आज उसीका
स्वागत मेरी मधुशाला।

रस्म कहो या विधि, नाम कुछ भी दो, किसी न किसी तरह से हम सब उसके क़ैदी हैं। शास्त्रोक्त कर्मों के पिछे जो अर्थ, जो कारण था, वह तो तहस-नहस हो चुका है। अब, रस्म निभाई जाती है, एक अनूठे-असाधारण से भय के कारण। मेरी पीढ़ी को किसी रस्म की तर्क की पहचान नहीं, मुझसे पहले की पीढ़ी ने कभी अर्थ पुछा नहीं, उनके पहले की पीढ़ी अब रही नहीं।

परंपरा के जानकार नहीं है; गलती करते है और क्षमा माँगते हैं, यह भी पता नहीं होता, गलती हूई भी या नहीं। इतना डर, इतना भय, कि भक्ति के लिए समय नहीं। किसी भी विश्वास का आधार क्या होता है?

आस्तिक होने का दंड है, या फिर अज्ञान होने का…

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5 विचार “विधि-लिखित&rdquo पर;

  1. भाई अनुनाद, स्वागत के लिए धन्यवाद। आपके विचार का आदर है, किंतु, व्याकरण एक तरह से लेखक का औजार है। अगर कोई चित्रकार गलत रंग और टूटें ब्रश का उपयोग करें, तो, विचार कितना भी गहरा हो, कितना भी सुंदर हो, श्रोताओं का ध्यान गलतियों पर अधिक होगा।

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