वियोगात्मक तंत्रज्ञान?

पता नहीं अगर यह उचित अनुवाद है, पर देख रहा हूँ कि यह अब हमारे-तुम्हारे जीवन का एक अटूट अंग हो रहा है। शब्दकोष से अनुवाद किया – वियोगात्मक तंत्रज्ञान, या फिर, आयसोलेशन टेक्नोलॉजी।

वियोगात्मक तंत्रज्ञान के कुछ उदाहरण – मोबाइल फोन, आय-पॉड एवं अन्य एम्पिथ्री प्लेयर्स, चॅट, इत्यादि। इन में से कुछ साधन ऐसे हैं, जो संवाद की क्रिया को समर्थ करते तो हैं, किंतु, संवाद करनेवालों के बीच की दूरी कायम रखतें हैं, संवाद के कला और कौशल को नष्ट करते हैं। यह प्रस्ताव जब एक सहेली को बतलाया, तो वह अनपेक्षित क्रोध से बोली, “बुलशिट!” मैं चकित हुआ, चुप रहा, प्रस्ताव वापस ले लिया। कही, उस साँड के मल-मूत्र मे मेरे तर्क का प्रमाण मुझे मिल गया।

बहस और चर्चा करना एक कला है। अच्छे बहस या चर्चा के लिए आवश्यक है, अपने विचारों को उचित तरह से संकलन कर, उन्हें प्रस्तुत करना। बहस में, अपने प्रतिपक्षी के शब्द ही नहीं, उनके भाव को भी पहचानना। उनके दलील का स्पष्टीकरण माँगना, अपने विचारों को विस्त्रुत में बताना। चॅट जैसे उपकरणों से यह संभव नहीं। ब्लॉगिंग कुछ अलग है, पर यह भी एक हद्द के बाद वियोगी ही है। विचार सरल, स्पष्ट और सुन्दर तरह से सादर होतें हैं, किंतु, प्रायः हम या तो अपना ब्लॉग लिखते रहते हैं, या किसी और का पढ़्ते रहते हैं। वियोग का एक अलग रूप। व्यक्तिगत रूप से, मुझे आमने-सामने बहस या चर्चा करने में ज्यादा आनंद मिलता है। आप ही सोचें, आपको चॅट सत्र याद रहते हैं, या फिर किसी कॉफी शॉप में मित्रों से मुलाकतें? किसमें आपने ज्यादा आनंद उठाया?

इन उपकरणों का लाभ भी है, मैं इनका तिरस्कार नहीं करता। मैं स्वयं मोबाइल और चॅट का बहुत उपयोग करता हूँ, हाँ, पर आय-पॉड का नहीं, उसका संभवतः तिरस्कार है।

अपनी एक अलग दुनिया होना अच्छा है, पर इतनी भी वियोगी ना हो के, मेल-जोल बंद हो, मानवीय सम्बन्ध ना रहें!

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14 विचार “वियोगात्मक तंत्रज्ञान?&rdquo पर;

  1. हमारी राय तो यही है भाई कि ये सारे साधन आमने-सामने की बातचीत के अस्थाई विकल्प हैं.आमने-सामने की बातचीत का कोई स्थाई विकल्प नहीं है.’बाडीलैंग्वेज’का संप्रेषण में बहुत महत्व होता है.’लोल’किसी के भी ठहाके का कभी विकल्प नहीं हो सकता.पर ब्लाग खाली बातचीत ही नहीं है.यह आपके विचारों का संचयन भी है.लेख लिखने के लिये बधाई.

  2. You are quite right to an extend.

    However, the blogging and some more modification on similar kind actually materialize a communication which is not possible in present scenario.

    Secondly, technology in itself is nothing. It is a mere toy. But it is meaning when you put it to a use which facilitate you. You can move or fly. But automobiles and flying machines make it possible. Now they are not everything. They facilitate you.

    The communication is the core of social human existence. I believe, it is communication which makes you human being. Now all these technological advancements which are coming up every next day, help to establish the communication. No doubt, I may not feel and understand Atul the way I had been able to do, if we both are sitting face to face. Even then, it does not mean one or two seatings in a coffee shop or some party. It requires more meeting. But is it possible under different constraints which are equally important.

    Well, when any new change come before us, the earlier scenarios keep on calling us back. How was it writing a letter to friend and going to postoffice to drop the letter.

    Secondly, I believe, dissatifaction with what is here with us today is more important feature of human existence. I never say O God, give my Shanti. I do not like Shanti, our maid.

  3. That’s a good post Atul, commendable because of the ‘shudh hindi’, even thou’ it took me twice the time to get thru’ it:) I agree with you there’s nothing like a face to face chat with a friend, but isn’t this isolation technology a blessing in disguise where a few years ago one couldn’t stay so much in touch with others across distances becoz there wasn’t any feasible means.
    -swati

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