मेरे शब्द और मैं

"आप इतनी अच्छी हिंदी बोल लेते हो?" बम्बई में रह कर, आपकी पूरी दुनिया सुधर सकती है. आपकी भाषा, मगर, भ्रष्ट हो जाएगी, शायद नष्ट भी हो जाएगी. पता नही कहाँ, पता नहीं क्यूँ, बम्बई के बाहर, मैं अच्छी हिंदी बोल लेता हूँ. आयेला, गयेला, लागेला - इन शब्दों का प्रयोग बम्बई के बाहर नहीं … पढ़ना जारी रखें मेरे शब्द और मैं

चलो इक बार फीर से…

चलो प्रणय के बंधन में हमारी किस्मत का विवाह कर लें। कुछ रंग फीका है, पर एक नाक्शा है मेरे हाथों में। शायद कुछ रास्ते याद आ जाएं, जो हम भूल गये हैं। किसी कविता से प्रेरित हो, मैं तुम से प्यार करूँ, तुम भी इन रास्तों पर चल कर कुछ याद करो। मैं कविता … पढ़ना जारी रखें चलो इक बार फीर से…

की ट्रांस

कुछ एक घंटा हो गया है अब कई बार खोज कर चुका हूँ . पर अब तक की ट्रांस मे 60 लिख नही पा रहा हूँ . हमेशा साथ हो जाता है . अक्षरों को कैसे भी जोड़ो , साथ ही निकल आता है . क्या आप मे से कोइ जानता है की ट्रांस मे … पढ़ना जारी रखें की ट्रांस

अब बस

कुछ ऐसे अनोखे भाव कभी बोल कर भी व्यक्त नहीं होते शब्दों की गाड़ी उनके भाग्य में नहीं होती सबसे चहेते होते ऐसे भाव रह जाते उनके सृष्टा के पास बन बैठते उनके लाडले। पर अब उन्हें जाना होगा मेरे घर में अब जगह नहीं इन्हें किस कारण अब तक पोसा छाती पर इनका तांडव … पढ़ना जारी रखें अब बस

एक नई शुरुआत

बहुत दिन हुए, हिन्दी में लिखे हुए। शायद यहाँ, वर्डप्रेस पर और लिखा जायेगा। नई शुरुआत करने के कारण कई होते है, कारण ना होने का भी कभी कारण होता है?  ७ सितम्बर २००५ को हिन्दी में पहला चिट्ठा लिखा था, आज, कुछ एक साल बाद, यहाँ एक नई शुरुआत । पिछले कुछ महीनों से … पढ़ना जारी रखें एक नई शुरुआत

अकेले, साथ में

इस भीड़ में हम अकेले हैं थैली के हठी मूठ को बार-बार कंधे पे चढ़ाते हैं, उनको जगह पर रखने के लिये, पर वे मानते नहीं; फिसलतें हैं वे आराम की खोज मे रहते हैं एक नन्ही सी शुभ-कामना, छोटी सी चर्चा और हम अकेले चलते है वर्णहीन भावनाओं से अपने आप को बचाते है, … पढ़ना जारी रखें अकेले, साथ में