प्रति व्यर्थ

जिसे हम व्यर्थ कहते है, वह हमारी एक-विमीय सोच का नातीजा है। कोइ दुसरा तरिका तो होगा? हमारी कल्पना की सीमा का अंत जहां होता है, वहीं पर हर निरर्थक बात शुरु होती है। जब हम संकल्प का आभाव अनुभव करते हैं, हम उसे, व्यर्थ कहते हैं। संकल्प सुनिश्चित होते हैं; पर हमारी इच्छा व्यक्तिपरक और सीमीत होती है। हमें इस घेरे से बाहर निकलना … पढ़ना जारी रखें प्रति व्यर्थ

अब नहीं

कुछ बातें ऐसी होती है जो चाहने पर भी भूली नहीं जाती। कुछ लोग भी ऐसे होते हैं। तुम उन में से एक हो। तुम्हारा गुस्सा जायज़ था, शायद, पर तब के मेरे हालत तुम्हारे गुस्से से भी जायज़ थे। और तुम मेरे हालात को खूब पहचानते थे। जब उन हालात के नीचे मैं पूरी … पढ़ना जारी रखें अब नहीं

वो नहीं अाते, उनकी याद अाती है

वो कुछ लोग है, कुछ यादें है वो कुछ लमहें है, कुछ साल है। इस दिन, हर साल यहीं हमारी अकेले में बातचीत है।

चलो इक बार फीर से…

चलो प्रणय के बंधन में हमारी किस्मत का विवाह कर लें। कुछ रंग फीका है, पर एक नाक्शा है मेरे हाथों में। शायद कुछ रास्ते याद आ जाएं, जो हम भूल गये हैं। किसी कविता से प्रेरित हो, मैं तुम से प्यार करूँ, तुम भी इन रास्तों पर चल कर कुछ याद करो। मैं कविता … पढ़ना जारी रखें चलो इक बार फीर से…

नहीं, आप नहीं

नहीं, नहीं, आप नहीं मैं ही कुछ बदल सा गया हूँ। जिस राह पर हम साथ चल रहे थे उस राह से थोडा भटक गया हूँ, आप सब को अब भी साथ देखता कर जाहिर है, मैं ही बहक गया हूँ। नहीं, नहीं, आप नहीं मैं ही कुछ बदल सा गया हूँ। कुछ सपने हम … पढ़ना जारी रखें नहीं, आप नहीं